पाठ्यक्रम: GS2/IR
चर्चा में क्यों?
- भारत और जापान ने समुद्री सुरक्षा सहयोग पर एक समझौता व्यवस्था (MoA) पर हस्ताक्षर किए तथा सूचना साझाकरण, नौसैनिक अभ्यास, जहाजों की मरम्मत और लॉजिस्टिक्स सहायता सहित परिचालन सहयोग को बेहतर करने पर सहमति व्यक्त की।
भारत-जापान संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- भारत और जापान के बीच ऐतिहासिक संबंध छठी शताब्दी तक जाते हैं, जब जापान में बौद्ध धर्म का प्रवेश हुआ और इससे दोनों देशों के बीच सुदृढ़ सांस्कृतिक निकटता विकसित हुई।
- 1949 में, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने टोक्यो के उएनो चिड़ियाघर को आशावाद के प्रतीक के रूप में एक हाथी भेंट किया।
- 1957 में जापान के प्रधानमंत्री नोबुसुके किशी ने भारत का दौरा किया और 1958 में जापान ने भारत को अपना प्रथम औपचारिक येन ऋण प्रदान किया।
भारत-जापान संबंधों का अवलोकन
- रणनीतिक संबंध: भारत और जापान ने वर्ष 2000 में वैश्विक साझेदारी से अपने संबंधों को बढ़ाकर 2014 में विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदारी के स्तर तक पहुंचाया। वर्ष 2006 से दोनों देशों के बीच वार्षिक शिखर सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं।
- दोनों देशों के बीच 70 से अधिक संवाद तंत्र हैं, जिनमें 2+2 विदेश एवं रक्षा संवाद, आर्थिक एवं सुरक्षा परामर्श तथा प्रौद्योगिकी, रक्षा, ऊर्जा, बुनियादी ढाँचे और स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में सहयोग शामिल हैं।
- भारत की एक्ट ईस्ट नीति , SAGAR के सिद्धांत और इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव (IPOI) तथा जापान के मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत (FOIP) के दृष्टिकोण के बीच पर्याप्त सामंजस्य है, जिसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के रणनीतिक हितों में अभिसरण हुआ है।
- आर्थिक संबंध: भारत-जापान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) अगस्त 2011 में लागू हुआ।
- इसमें वस्तुओं एवं सेवाओं का व्यापार, व्यक्तियों की आवाजाही, निवेश, बौद्धिक संपदा, सीमा शुल्क तथा व्यापार से संबंधित अन्य विषय शामिल किए गए।
- वर्ष 2011 में भारत और जापान के बीच व्यापार की 94% वस्तुओं पर लागू शुल्कों में 2021 तक कमी की गई।
- वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का जापान के साथ कुल व्यापार 27.48 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जिसमें निर्यात 6.04 अरब अमेरिकी डॉलर और आयात 21.44 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। वर्ष 2024-25 में जापान के कुल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 1.4% रही और भारत जापान का 18वाँ सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था, जबकि भारत के कुल व्यापार में जापान की हिस्सेदारी 2.1% रही और जापान भारत का 17वाँ सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था।
- भारत के प्रमुख निर्यातों में कार्बनिक रसायन, वाहन (रेलवे एवं ट्राम को छोड़कर), परमाणु रिएक्टर, एल्युमिनियम एवं उससे संबंधित वस्तुएँ तथा मछली एवं अन्य जलीय अकशेरुकी शामिल हैं। भारत के प्रमुख आयातों में परमाणु रिएक्टर, तांबा एवं उससे संबंधित वस्तुएँ, विद्युत मशीनरी एवं उपकरण, अकार्बनिक रसायन तथा लोहा एवं इस्पात शामिल हैं।
- रक्षा: रणनीतिक हितों में बढ़ते अभिसरण के साथ भारत-जापान रक्षा सहयोग लगातार सुदृढ़ हो रहा है।
- दोनों देश नियमित रूप से थल सेना, नौसेना और वायु सेना के स्टाफ वार्ता आयोजित करते हैं तथा द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय सैन्य अभ्यासों में भाग लेते हैं।
- प्रमुख समझौतों में 2014 का रक्षा सहयोग समझौता ज्ञापन, 2015 के रक्षा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं गोपनीय सूचना से संबंधित समझौते, 2018 की नौसैनिक सहयोग व्यवस्था तथा 2020 का पारस्परिक आपूर्ति एवं सेवा प्रावधान (RPSS) समझौता शामिल हैं।
- RPSS समझौते का उपयोग MILAN 2022 से सैन्य अभ्यासों में किया जा रहा है।
- भारत और जापान भारतीय नौसेना के लिए UNICORN रेडियो एंटीना मास्ट का सह-विकास भी कर रहे हैं। यह दोनों देशों के बीच प्रथम सहयोगात्मक रक्षा उपकरण विकास कार्यक्रम है।
- दोनों देश नियमित रूप से थल सेना, नौसेना और वायु सेना के स्टाफ वार्ता आयोजित करते हैं तथा द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय सैन्य अभ्यासों में भाग लेते हैं।
- मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) परियोजना: भारत का प्रथम हाई-स्पीड रेल (HSR) कॉरिडोर मुंबई से अहमदाबाद के बीच जापान की तकनीकी एवं वित्तीय सहायता से विकसित किया जा रहा है।
- महाराष्ट्र, गुजरात और केंद्रशासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली में इसके 12 स्टेशन होंगे तथा कॉरिडोर की लंबाई 508.17 किमी है।
- इस परियोजना में ‘मेक इन इंडिया’ के साथ-साथ क्षमता विकास पर भी बल दिया गया है, ताकि भारतीय कार्यबल जापानी शिंकानसेन HSR प्रौद्योगिकी से संबंधित आवश्यक कौशल प्राप्त कर सके।
- एक्ट ईस्ट फोरम: दिसंबर 2017 में स्थापित एक्ट ईस्ट फोरम का उद्देश्य भारत की एक्ट ईस्ट नीति और जापान के मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत के दृष्टिकोण के अंतर्गत भारत-जापान सहयोग को मजबूत करना है।
- यह उत्तर-पूर्वी भारत के आर्थिक विकास पर केंद्रित है, जिसमें कनेक्टिविटी, बुनियादी ढाँचा, औद्योगिक संपर्क तथा जन-से-जन संबंध शामिल हैं। इसकी सबसे हालिया बैठक 2024 में आयोजित हुई।
- भारत की प्रथम हाई-स्पीड रेल परियोजना, मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR), जापान की तकनीकी एवं वित्तीय सहायता से विकसित की जा रही है। इसमें 12 स्टेशन और 508.17 किमी लंबा मार्ग है। यह परियोजना मेक इन इंडिया को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ भारतीय श्रमिकों को जापान की शिंकानसेन प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षित करती है।
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: 2025-26 को भारत-जापान विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार आदान-प्रदान वर्ष घोषित किए जाने से भारत-जापान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग को बढ़ावा मिला है, जिसकी शुरुआत 1985 में हुई थी।
- ISRO और JAXA अंतरिक्ष सहयोग के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, जिसमें उपग्रह नेविगेशन, अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता और चंद्र अन्वेषण शामिल हैं।
- इनका प्रमुख संयुक्त कार्यक्रम लूनर पोलर एक्सप्लोरेशन मिशन (Chandrayaan-5) है, जिसके लिए 2025 में कार्यान्वयन समझौते पर हस्ताक्षर किए गए और इसका प्रक्षेपण 2026-27 में निर्धारित है।
- शिक्षा एवं संस्कृति: भारत और जापान विश्वविद्यालयों के बीच साझेदारी, शिक्षक-छात्र आदान-प्रदान, छात्रवृत्तियों तथा जापानी भाषा कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र में अपने संबंधों को सुदृढ़ कर रहे हैं।
- प्रत्येक वर्ष 100 से अधिक सहयोगात्मक शोध परियोजनाएँ संचालित होती हैं तथा LOTUS और Sakura जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सैकड़ों छात्रों एवं शिक्षाविदों का आदान-प्रदान होता है।
- 2025 के सांस्कृतिक आदान-प्रदान संबंधी समझौता ज्ञापन (MoU) ने कला, संग्रहालयों और विरासत संरक्षण के क्षेत्र में सांस्कृतिक सहयोग की पुनः पुष्टि की। जापान में भारतीय समुदाय की संख्या बढ़कर लगभग 59,000 हो गई है, जिसमें IT पेशेवर, इंजीनियर और व्यवसायी शामिल हैं।
साझेदारी का महत्व
- भू-राजनीतिक संतुलन: दोनों देश “मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत” (FOIP) के समर्थक हैं, जो क्षेत्रीय एकतरफावाद के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण संतुलन प्रदान करता है तथा नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था को सुदृढ़ करता है।
- दोनों देश मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत की साझा दृष्टि तथा क्षेत्र के अन्य साझेदारों, जैसे इंडोनेशिया, के साथ द्विपक्षीय संबंधों से आगे बढ़कर गहन सहयोग को प्रोत्साहित करते हैं।
- आर्थिक पूरकता: जापान की उन्नत प्रौद्योगिकी, रणनीतिक पूंजी और औद्योगिक विशेषज्ञता का भारत के तीव्रता से बढ़ते बाजार, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना तथा विशाल युवा श्रमबल के साथ महत्वपूर्ण सामंजस्य है।
- बहुपक्षीय सहयोग: दोनों देश क्वाड (Quad)—जिसमें अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं—तथा G20 जैसे मंचों के माध्यम से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लचीली और विविधीकृत आपूर्ति शृंखलाएँ विकसित करने के प्रयासों का नेतृत्व कर रहे हैं।
- समुद्री सहयोग: सहयोग के अंतर्गत द्विपक्षीय अभ्यासों का विस्तार किया जाएगा तथा मानवरहित प्रणालियों और बहु-क्षेत्रीय अभियानों का उपयोग करते हुए अधिक जटिल सैन्य अभ्यासों को शामिल किया जाएगा।
- इससे भारत और जापान के बीच रणनीतिक एवं परिचालन अभिसरण को समग्र रूप से बढ़ावा मिलेगा। यह भारत के सैन्य विनिर्माण और जहाज निर्माण संबंधी लक्ष्यों तथा जापान के सुरक्षित समुद्री मार्गों एवं स्थिर हिंद-प्रशांत से जुड़े हितों को आगे बढ़ाएगा।
मुद्दे एवं चिंताएँ
- कमजोर व्यापार: द्विपक्षीय व्यापार लगभग 27.5 अरब अमेरिकी डॉलर है। दोनों देशों के नेता स्वीकार करते हैं कि दोनों अर्थव्यवस्थाओं के आकार को देखते हुए यह व्यापार इसकी संभावित क्षमता का केवल एक छोटा हिस्सा है।
- नियामकीय एवं बाजार संबंधी बाधाएँ: जापानी कंपनियों को कठोर नियामकीय आवश्यकताओं और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के अनुपालन का सामना करना पड़ता है, जबकि भारतीय निर्यातकों को जापान में कड़े पादप एवं स्वास्थ्य संबंधी जांच से गुजरना पड़ता है।
- रक्षा उत्पादन में बाधाएँ: सैन्य अभ्यासों की उच्च आवृत्ति के बावजूद, दीर्घकालिक रक्षा सह-उत्पादन व्यवस्थाएँ, जैसे ShinMaywa US-2 उभयचर विमान, मूल्य निर्धारण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण संबंधी चिंताओं और खरीद प्रक्रियाओं में देरी के कारण आगे नहीं बढ़ सकी हैं।
- भू-राजनीतिक मतभेद: कई मुद्दों पर—जैसे यूरेशिया की सुरक्षा अथवा पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंध—भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता पर बल देता है, जबकि जापान G7 के साथ सुदृढ़ रूप से जुड़ा हुआ है।
निष्कर्ष
- भारत-जापान साझेदारी एक पारंपरिक दाता-प्राप्तकर्ता संबंध से आगे बढ़कर समान साझेदारों की रणनीतिक साझेदारी में परिवर्तित हो गई है, जिसमें प्रौद्योगिकी सहयोग, ऊर्जा परिवर्तन तथा रक्षा एवं सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
- नियामकीय बाधाओं को दूर करके तथा रक्षा प्रौद्योगिकी समझौतों को वास्तविक परिचालन क्षमताओं में परिवर्तित करके भारत और जापान की रणनीतिक क्षमता को पूरी तरह साकार किया जा सकता है।
- यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दीर्घकालिक स्थिरता और आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
स्रोत : TH
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